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नव संवत्सर 2078

आज से नव संवत्सर 2078 आरम्भ हो रहा है...

आइए जानते हैं नव संवत्सर के विषय में...

प्रश्न: विक्रमी सम्वत् क्या है?
उत्तर: आज से ठीक 2078 वर्ष पूर्व उज्जैन की पावन धरती पर महान सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ था। उस दिन से सम्राट विक्रमादित्य के सम्मान में विक्रमी सम्वत् की काल गणना आरम्भ हुई।

प्रश्न: सम्राट विक्रमादित्य इतने महान क्यों थे कि उनके नाम से नया संवत्सर आरम्भ हुआ?
उत्तर: सम्राट विक्रमादित्य मध्य भारत के भूभाग पर राज्य करते थे और उनके राज्य की राजधानी उज्जैन थी। उन्होंने उस समय शक्तिशाली शक राजाओं जो भारत के अधिकांश भूभाग पर राज करते थे उन्हें परास्त कर भारत भूमि से बाहर खदेड़ दिया था। इसलिए उन्हें शकारि की उपाधि प्राप्त हुई। "शकारि' अर्थात् शकों का अंत करने वाला। उनके काल में भारत अत्यधिक शक्तिशाली एवं समृद्ध देश बना। उन्होंने पूरे देश के तीर्थ स्थानों का पुनरुद्धार करवाया और अनेकों मन्दिरों की स्थापना करवाई। इन्होंने राजसूय और अश्वमेध यज्ञ किये और अरब इराक तक के राजाओं को सम्राट विक्रमादित्य से मैत्री सन्धि करनी पड़ी। उन्होंने अपनी प्रजा के समस्त ऋणों का भार स्वयं वहन कर उसे चुका दिया और महान सम्राट युद्धिष्ठिर के बाद ऐसा करने वाले वे दूसरे सम्राट बने। इसलिए उनके नाम से विक्रमी सम्वत् आरम्भ हुआ।

प्रश्न: क्या विक्रमी सम्वत् से पूर्व भी कोई सम्वत् था?
उत्तर: विक्रमी सम्वत् से पूर्व भारत में शक सम्वत् प्रचलित था जो शक राजाओं द्वारा चलाया गया था। उससे पूर्व युधिष्ठिर सम्वत् प्रचलन में था जो महान सम्राट युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के दिन से आरम्भ हुआ था जो कि चैत्र मास, शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा का पावन दिन ही था। उससे पूर्व भारतवर्ष में सप्तऋषि सम्वत् प्रचलन में था जिसके आधार पर काल गणना की गई थी।

प्रश्न: भारत में काल गणना का क्या इतिहास है?
उत्तर: वर्षारंभ का दिन अर्थात नववर्ष दिन । इसे कुछ अन्य नामोंसे भी जाना जाता है । जैसे कि, संवत्सरारंभ, विक्रम संवत् वर्षारंभ, वर्षप्रतिपदा, युगादि, गुडीपडवा इत्यादि । इसे मनाने के अनेक कारण हैं ।

सर्व ऋतुओंमें बहार लानेवाली ऋतु है, वसंत ऋतु । इस काल में उत्साहवर्धक, आह्लाददायक एवं समशीतोष्ण वायु होती है । शिशिर ऋतु में पेडोंके पत्ते झड चुके होते हैं, जबकि वसंत ऋतु के आगमन से पेडोंमें कोंपलें अर्थात नए कोमल पत्ते उग आते हैं, पेड-पौधे हरे-भरे दिखाई देते हैं । कोयल की कूक सुनाई देती है । इस प्रकार भगवान श्रीकृष्णजी की विभूतिस्वरूप वसंत ऋतु के आरंभ का यह दिन है ।

सत्ययुग में इसी दिन ब्रह्मांड में विद्यमान ब्रह्मतत्त्व पहली बार निर्गुण से निर्गुण-सगुण स्तर पर आकर कार्यरत हुआ तथा पृथ्वी पर आया ।

सृष्टि के निर्माण का दिन
ब्रह्मदेव ने सृष्टि की रचना की, तदूपरांत उसमें कुछ उत्पत्ति एवं परिवर्तन कर उसे अधिक सुंदर अर्थात परिपूर्ण बनाया । इसलिए ब्रह्मदेवद्वारा निर्माण की गई सृष्टि परिपूर्ण हुई, उस दिन गुडी अर्थात धर्मध्वजा खडी कर यह दिन मनाया जाने लगा ।

चैत्रे मासि जगद् ब्रम्हाशसर्ज प्रथमेऽहनि ।
– ब्रम्हपुराण
 
अर्थात, ब्रम्हाजी ने सृष्टि का निर्माण चैत्र मास के प्रथम दिन किया । इसी दिन से सत्ययुग का आरंभ हुआ । यहीं से हिंदु संस्कृति के अनुसार कालगणना भी आरंभ हुई । इसी कारण इस दिन वर्षारंभ मनाया जाता है ।

भारतवर्ष में सूर्य और चन्द्रमा के आधार पर दो काल गणनाएं हैं जिन्हें सौर वर्ष और चन्द्र वर्ष कहा जाता है।

सौर वर्ष में भगवान सूर्य की स्थिति बारह अलग-अलग राशियों में स्थित होती है। जब भगवान सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रविष्ट होते हैं तो वह संक्रान्ति कहलाती है। संक्रान्ति अंग्रेज़ी माह के अनुसार प्रतिमाह 13-14 दिनांक को आती है। इनमें मकर संक्रान्ति अतिमहत्वपूर्ण होती है क्योंकि यह संक्रान्ति सूर्य देव के उत्तरायण में आने के बाद पहली संक्रान्ति होती है। इसे पूरे भारतवर्ष में प्रातः सूर्य पूजन और एक रात्रि पूर्व अग्निदेव पूजन के रूप में मनाया जाता है। इसे पोंगल, माघ बिहू, लोहड़ी आदि नामों से देश के विभिन्न भागों में मनाया जाता है। मकर संक्रांति प्रायः अंग्रेज़ी माह के 13-14 जनवरी को होती है। दूसरी महत्वपूर्ण संक्रांति मेष संक्रान्ति होती है जिस दिन सौर वर्ष आरम्भ होता है जिसे वैसाखी, विशु कानी, पाना संक्रान्ति, पुथन्दू, विशु, पहला बैशाख आदि नामों से पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है। मेष संक्रान्ति प्रायः अंग्रेज़ी माह के 13-14 अप्रैल को होती है।

दूसरा होता है चन्द्र मास जिसके आधार पर हमारे व्रत-त्योहार, लग्न-मुहूर्त आदि निर्धारित होते हैं।

चन्द्र मास चन्द्रमा की घटती-बढ़ती कलाओं पर आधारित होता है।

एक मास में 15-15 दिन के दो पक्ष होते हैं। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। सूर्य की दिशा की दृष्टि से वर्ष में भी छह-छह माह के दो अयन माने गए हैं- उत्तरायण तथा दक्षिणायन। वैदिक काल में वर्ष के 12 महीनों के नाम ऋतुओं के आधार पर रखे गए थे। बाद में उन नामों को नक्षत्रों के आधार पर परिवर्तित कर दिया गया, जो अब तक यथावत हैं। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन। इसी प्रकार दिनों के नाम ग्रहों के नाम पर रखे गए- रवि, सोम (चंद्रमा), मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि। इस प्रकार काल खंडों को निश्चित आधार पर निश्चित नाम दिए गए और पल-पल की गणना स्पष्ट की गई।

नव संवत्सर को युगादि, गुड़ी पाड़वा आदि नामों से भी भारतवर्ष में मनाया जाता है।

इसे युगादि इसलिए कहते हैं क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण एवं पाण्डवों के परलोक गमन के बाद इस दिन से कलियुग आरम्भ हुआ था जिसे आज 5122 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं।

यह दिन महाराष्ट्र में ‘गुडीपडवा’ के नाम से भी मनाया जाता है । गुडी अर्थात् ध्वजा । पाडवा शब्द में ‘पाड’ का अर्थ होता है पूर्ण; एवं ‘वा’ का अर्थ है वृद्धिंगत करना, परिपूर्ण करना । इस प्रकार पाडवा शब्द का अर्थ है, परिपूर्णता ।

इस दिन ब्रह्मध्वज (भगवा रङ्ग का  ध्वज जिसपर ॐ या स्वस्तिक का चिह्न हो) फहराया जाता है और यह प्रार्थना की जाती है:

ब्रह्मध्वज नमस्तेस्तु सर्वाभीष्ट फलप्रद ।

प्राप्तेस्मिन् वत्सरे नित्यं मद्गृहे मंगलं कुरू ।।

‘हे ब्रह्मदेव, हे विष्णु, इस ध्वजके माध्यमसे वातावरणमें विद्यमान प्रजापति, सूर्य एवं सात्त्विक तरंगें मुझसे ग्रहण हों । उनसे मिलनेवाली शक्ति तथा चैतन्य निरंतर बना रहे । इस शक्तिका उपयोग मुझसे अपनी साधना हेतु हो, यही आपके चरणोंमें प्रार्थना है !

इस दिन से उत्तर भारत में माँ शक्ति का नौ दिनों तक पूजन किया जाता है जिसे चैत्र नवरात्र भी कहते हैं। उसके पश्चात चैत्र शुक्ल पक्ष, नवमी के दिन युगपुरुष भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है।

प्रश्न: क्या महान सम्राट विक्रमादित्य और चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य एक ही व्यक्ति थे?

उत्तर: वामपंथी इतिहासकार सदैव सनातन धर्म के इतिहास को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करते आये हैं ताकि हमें हमारी प्राचीन सनातन संस्कृति पर गर्व न हो।

इसी कड़ी में उनका एक प्रयास था महान सम्राट विक्रमादित्य को काल्पनिक बनाना। चूंकि विक्रमी सम्वत् जो महान सम्राट विक्रमादित्य के राज्याभिषेक से आरम्भ हुआ था उसे झुठलाना उनके वश में नहीं था इस लिए उन्होंने गुप्त वंश के सम्राट चन्द्रगुप्त जिन्होंने बाद में विक्रमादित्य की उपाधि को धारण किया उन्हें उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के रूप में चित्रित कर दिया। वास्तव में उन दोनों सम्राटों के कालखण्ड में बहुत अधिक अन्तर था।

महान सम्राट विक्रमादित्य के कालखण्ड का वर्णन हमारे पुराणों में बहुत सटीकता से वर्णित है जो विक्रमी सम्वत् के अनुसार पूर्णतः सटीक बैठता है।

उन्हीं के राज दरबार में नव रत्न हुए जो कि धन्वंतरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, बेताल भट्ट, घटखर्पर, कालिदास, वराहमिहिर और वररुचि थे।

सम्राट विक्रमादित्य के ही बेताल पच्चीसी एवं सिंहासन बत्तीसी आदि कहानियां लिखी गई।

उनके कालखंड को झुठलाना एवं सम्राट विक्रमादित्य को काल्पनिक बताना वामपंथी इतिहासकारों का कुकृत्य है जिनकी कलम मात्र मुगलों के महानता प्रदर्शित करने में चली। उसके पहले का इतिहास उन्हें न पता है और न ही वे जानना चाहते।

प्रश्न: विक्रमी सम्वत् और शालिवाहन शक सम्वत् में क्या भेद है।

उत्तर: सम्राट विक्रमादित्य द्वारा विक्रमी सम्वत् आरम्भ किया गया। उससे लगभग 526 वर्ष पूर्व शकों द्वारा शक सम्वत् आरम्भ किया गया था जो कि भारतीय काल गणना पर ही आधारित था। उसमें गणितीय त्रुटियों का संशोधन कर के सम्राट विक्रमादित्य द्वारा विक्रमी सम्वत् आरम्भ किया गया। सम्राट विक्रमादित्य के परलोक गमन के बाद जब शकों का प्रभाव भारत में पुनः बढ़ने लगा तब शालिवाहन राजा ने पुनः शकों का अंत कर के शकान्त सम्वत् का आरम्भ किया जिसे शालिवाहन शक सम्वत् कहा जाता है। आज से वर्तमान शक सम्वत् 1943 आरम्भ हो चुका है।

आपको संभवतः यह ज्ञात न हो कि पहले पूरे विश्व में भारतीय काल गणना के अनुसार ही नव वर्ष मार्च-अप्रैल में ही मनाया जाता था। रोमन सम्राट जूलियस सीजर ने जूलियन कैलेंडर का आरम्भ किया और उसमें अपने नाम का एक माह 'जुलाई' अतिरिक्त जोड़ा। उसके पश्चात ऑगस्टस सीजर रोम का सम्राट बना जिसने अपने नाम का माह 'अगस्त' कैलेण्डर में जोड़ा।

इन दोनों के कारण सेप्टेम्बर जो कि वर्ष का (सेप्टा) सातवां महीना था वो नौवा महीना हो गया। ऑक्टोबर (ऑक्टा) आठवां माह दसवां हो गया। नवम्बर (नोवा) नौवा महीना ग्यारहवां हो गया और दिसम्बर (डेका) दसवां महीना बारहवां हो गया।

फिर उसके बाद ईसाई पोप ग्रेगोरी आये जिन्होंने ईसा के जन्म से आरम्भ करके जूलियन कैलेंडर को ईसवी कैलेंडर बना दिया।

और आज हम दासता की मानसिकता से प्रभावित वही गलत गिनती पढ़ रहे हैं।

मेरे लिए सम्राट जूलियस सीजर से अधिक महान सम्राट विक्रमादित्य अधिक महत्वपूर्ण हैं और अटपटे ईसवी सम्वत् जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है से अधिक अपना विक्रमी सम्वत् जो पूर्णत: वैज्ञानिक आधार पर निर्मित है वह महत्वपूर्ण है। अतः आप सभी से करबद्ध निवेदन है कि विदेशी मानसिकता से निकलिये और अपने प्राचीन गौरवशाली इतिहास पर गर्व कीजिये।

आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक मङ्गल कामनाएं🙏🏼